Iran – ईरान – पर्सिया

Iran का इतिहास: विस्तृत विवरण

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Iran (जिसे प्राचीन काल में पर्सिया के नाम से भी जाना जाता था) का पूर्ण इतिहास हिंदी में विस्तार से दिया गया है। यह इतिहास पूर्व-इतिहास से लेकर वर्तमान समय (जनवरी 2026 तक) तक कालानुक्रमिक रूप से संरचित है, जिसमें प्रमुख घटनाएँ, शासक, साम्राज्य, आक्रमण, सांस्कृतिक विकास और आधुनिक राजनीतिक परिवर्तन शामिल हैं। जानकारी संतुलित दृष्टिकोण से ली गई है, विशेष रूप से विवादास्पद घटनाओं जैसे क्रांतियों और युद्धों पर।

पूर्व-इतिहास (प्रागैतिहासिक काल)

ईरान का इतिहास मानव गतिविधियों के शुरुआती प्रमाणों से शुरू होता है। लगभग 1,00,000 वर्ष पहले मध्य पुरापाषाण काल में कशफरुद और गंज पार जैसे स्थलों पर नेन्डर्थल मानवों द्वारा उपयोग किए गए मॉस्टरियन औजार मिले हैं, विशेष रूप से ज़ाग्रोस पर्वतों में जैसे बिसितुन गुफा। ऊपरी पुरापाषाण और एपिपैलियोलिथिक काल में केरमानशाह और खोर्रमाबाद की गुफाओं में चट्टान कला के प्रमाण हैं। नवपाषाण काल (11,000 ईसा पूर्व से) में ज़ाग्रोस क्षेत्र में कृषि की शुरुआत हुई, जैसे चोगा गोलान और चोगा बोनुत में गेहूं की खेती। दक्षिण-पश्चिमी क्षेत्र, जो उपजाऊ चंद्रमा का हिस्सा था, में सुसा (4395 ईसा पूर्व स्थापित) और चोगा मिश (6800 ईसा पूर्व) जैसे स्थल थे, जहाँ शराब के जार और टेराकोटा मूर्तियाँ मिलीं। कांस्य युग में कुरा-आराक्स संस्कृति (3400–2000 ईसा पूर्व) उत्तर-पश्चिमी ईरान से काकेशस तक फैली, और जिरोफ्त संस्कृति (चौथी सहस्राब्दी ईसा पूर्व) में क्लोराइट वस्तुएँ और प्रारंभिक लेखन मिले। एलाम सभ्यता लगभग 4000 ईसा पूर्व सुसा में उभरी, जिसमें अनपढ़ित प्रोटो-एलामाइट लिपि थी। ईरानी लोगों के आने से पहले एलामाइट जैसे पूर्व-ईरानी समूह हावी थे, जो लौह युग में मिश्रित हुए।

प्राचीन काल (क्लासिकल एंटीक्विटी)

प्रारंभिक लौह युग में 20वीं शताब्दी ईसा पूर्व से असीरियन आक्रमण हुए, और पोंटिक-कैस्पियन स्टेप्पे से जनजातियाँ आईं। मध्य-प्रथम सहस्राब्दी ईसा पूर्व तक मेदेस, फारसी और पार्थियन क्षेत्र में बस गए। मेदेस साम्राज्य ने 7वीं शताब्दी ईसा पूर्व में पश्चिमी ईरान को एकीकृत किया, जिसमें डियोसेस और सायकसेरेस जैसे शासकों ने 612 ईसा पूर्व में नाइनवेह पर हमला कर असीरिया को हराया।

अचेमेनिड साम्राज्य (678–330 ईसा पूर्व) की शुरुआत साइरस द ग्रेट ने 550 ईसा पूर्व मेदेस को हराकर की, जो पश्चिम एशिया, मध्य एशिया, दक्षिण-पूर्व यूरोप और उत्तरी अफ्रीका तक फैला—तब तक का सबसे बड़ा साम्राज्य। साइरस ने लिडिया, नव-बेबीलोनिया और मिस्र को जीता। दारा प्रथम ने सिक्के (दारिक और शेकेल) मानकीकृत किए, रॉयल रोड सुधारित की और पर्सेपोलिस व सुसा बनवाए। साम्राज्य ने सहिष्णुता को बढ़ावा दिया। ग्रीको-फारसी युद्ध (499–449 ईसा पूर्व) में मैराथन, सलामिस और प्लेटिया में हार हुई। अलेक्जेंडर द ग्रेट ने 331 ईसा पूर्व साम्राज्य जीता, जिसे सेल्यूसिड साम्राज्य (312–248 ईसा पूर्व) में विभाजित किया।

पार्थियन साम्राज्य (248 ईसा पूर्व–224 ईस्वी) ने उत्तर-पश्चिमी ईरानी अर्सासिड्स के नेतृत्व में पठार को एकीकृत किया, सेल्यूसिड क्षेत्रों को जीता। यह रोम का प्रतिद्वंद्वी था, कैर्रहे में हराया, लेकिन घेराबंदी में कमजोर। सासानियन साम्राज्य (224–651 ईस्वी) अर्दशीर प्रथम द्वारा स्थापित, आर्थिक और सैन्य सुधारों के साथ ईरान, इराक, काकेशस, लेवांत और मध्य एशिया तक फैला। खोसरो द्वितीय ने मिस्र जीता। रोमन-सासानियन युद्धों में 602–628 का युद्ध मुस्लिम विजयों से समाप्त हुआ। सासानियन संस्कृति ने रोम, यूरोप, अफ्रीका, चीन और भारत को प्रभावित किया।

मध्यकाल (मीडिवल पीरियड)

मुस्लिम विजय (633–651) राशिदुन खलीफा उमर के नेतृत्व में हुई, जिसने सासानियनों को हराया। यज़्देगर्ड तृतीय की 651 में हत्या के बाद इस्लामीकरण शुरू हुआ, लेकिन फारसी तत्व बने रहे। उमय्यद (661–750) ने फारसी रीति अपनाई, अरबी को आधिकारिक बनाया और धिम्मी कर लगाए। अब्बासिद (750–1258) ने बगदाद को राजधानी बनाया, फारसी प्रशासन को बढ़ावा दिया। क्षेत्रीय राजवंश उभरे: ताहिरिड्स, सफारिड्स, समानिड्स (रुदाकी के माध्यम से फारसी संस्कृति पुनरुद्धार), बुइड्स और गजनवीद्स (महमूद ने भारत विस्तार किया)। सेल्जूक्स (11वीं शताब्दी) ने ईरान जीता, निज़ाम अल-मुल्क के नेतृत्व में फारसी संस्कृति संरक्षित।

इस्लामीकरण उमय्यद काल में धीमा था (655 तक 10%), अब्बासिद में तेज़ (11वीं शताब्दी तक 90%)। शू’उबिया आंदोलन ने इस्लाम में फारसी पहचान संरक्षित की। इस्लामी स्वर्ण युग में फारसी विद्वान जैसे अविसेना ने दर्शन, चिकित्सा और विज्ञान में योगदान दिया।

मंगोल आक्रमण (1219–1221) जंगेज खान के नेतृत्व में हुआ, समरकंद और गुर्गंज जैसे शहर नष्ट किए, लाखों मारे गए। इलखानाते (1256–1335) ने बगदाद को लूटा (1258), लेकिन गजान ने इस्लाम को राज्य धर्म बनाया। ब्लैक डेथ ने 14वीं शताब्दी में 30% आबादी मारी। तैमूर (1370–1507) ने शहर नष्ट किए लेकिन वास्तुकला और कविता को बढ़ावा दिया। उत्तराधिकारी जैसे करा कोयुनलु और एक कोयुनलु ने सफाविद्स तक शासन किया। सफाविद पूर्व सुन्नी इस्लाम हावी था (90%), शिया पॉकेट्स के साथ।

प्रारंभिक आधुनिक काल (अर्ली मॉडर्न पीरियड)

सफाविद्स (1501–1736) इस्माइल प्रथम के नेतृत्व में एकीकृत हुए, ट्वेल्वर शिया इस्लाम अपनाया, अजरबैजान से अफगानिस्तान तक जीता। तहमास्प प्रथम ने काकेशियंस को निर्वासित किया। अब्बास प्रथम (1587–1629) ने ओटोमन्स और उज्बेक्स के विरुद्ध विस्तार किया, खाड़ी से पुर्तगालियों को निकाला, केंद्रीकरण किया और इस्फहान में वास्तुकला को बढ़ावा दिया। बाद के शाहों में गिरावट आई; अफगानों ने 1722 में इस्फहान लूटा।

नादिर शाह (1736–1747) ने क्षेत्र बहाल किया, भारत आक्रमण (1739) में दिल्ली लूटा। हत्या के बाद अव्यवस्था, कज्जर विजय। ज़ंद के करीम खान (1751–1779) ने शांति दी लेकिन बसरा और बहरीन खोए।

उत्तर आधुनिक काल (लेट मॉडर्न पीरियड)

कज्जर (1796–1925) आगा मोहम्मद खान के नेतृत्व में एकीकृत, काकेशस नियंत्रित, त्बिलिसी लूटा (1795)। रूसो-फारसी युद्ध (1804–1813, 1826–1828) में काकेशस खोए, गुलिस्तान और तुर्कमेनचाय संधियाँ। फाथ-अली और नासिर अल-दीन शाहों ने यूरोपीय दबावों का सामना किया। महान फारसी अकाल (1870–1871) में 20 लाख मरे।

संवैधानिक क्रांति (1905–1911) ने संवैधानिक राजतंत्र स्थापित किया, पहली मजलिस 1906 में। ब्रिटिश तेल खोज (1908) ने एंग्लो-ईरानियन ऑयल कंपनी बनाई। प्रथम विश्व युद्ध में तटस्थ लेकिन कब्जा। रेज़ा खान का 1921 तख्तापलट और 1925 में कज्जरों का अंत पाहलवी राजवंश की स्थापना। रेज़ा शाह (1925–1941) ने राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्षता और आधुनिकीकरण किया, लेकिन दमन के कारण विद्रोह जैसे 1935 मशहद विद्रोह। द्वितीय विश्व युद्ध में एंग्लो-सोवियत आक्रमण (1941) ने उन्हें पदच्युत किया।

मोहम्मद रेज़ा शाह (1941–1979) ने शुरू में शक्ति साझा की लेकिन 1949 में केंद्रीकृत। 1951 में मोसद्देक द्वारा तेल राष्ट्रीयकरण से अबादान संकट, 1953 में सीआईए-एमआई6 समर्थित तख्तापलट। सफेद क्रांति (1963) ने भूमि सुधार किया लेकिन पादरियों को अलग किया। 1973 तेल उछाल ने सैन्यीकरण किया।

इस्लामी गणराज्य (1979–वर्तमान)

1979 क्रांति ने आयतुल्लाह खुमैनी के नेतृत्व में राजतंत्र उखाड़ा, इस्लामी गणराज्य स्थापित। वेलायत-ए फकीह पर आधारित, उद्योग राष्ट्रीयकृत। अमेरिकी दूतावास बंधक संकट (1979–1981) में 52 अमेरिकियों को 444 दिन रखा। ईरान-इराक युद्ध (1980–1988) में इराक आक्रमण, रासायनिक हथियार, 5-10 लाख हताहत। 1988 में राजनीतिक कैदियों की फाँसी (1400–30,000)।

खुमैनी की 1989 मृत्यु के बाद अली खामेनी सर्वोच्च नेता बने। रफसंजानी (1989–1997) ने अर्थव्यवस्था पुनर्निर्मित। खातामी (1997–2005) ने सुधार किए लेकिन रूढ़िवादियों का विरोध। अहमदीनेजाद (2005–2013) ने परमाणु विवाद, प्रतिबंध और 2009 ग्रीन मूवमेंट। रूहानी (2013–2021) ने जेसीपीओए (2015) पर हस्ताक्षर किया, ट्रंप ने 2018 में वापस लिया।

रईसी (2021–2024) की 2024 हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मृत्यु। पेजेशकियन 2024 में राष्ट्रपति बने। महसा अमीनी की 2022 मौत ने विरोध प्रदर्शन शुरू किए (476 मरे)। परमाणु संवर्धन जेसीपीओए सीमा पार, 2024 में इजराइल-ईरान हमले। सीरिया में असद शासन का 2024 पतन ईरान की हार। 2025 में यूरेनियम 60% शुद्धता, आईएईए गैर-अनुपालन, इजराइल हमले, अमेरिकी हवाई हमले, मिसाइल प्रत्युत्तर, लेकिन खाड़ी राज्यों से संघर्षविराम। कोविड-19 में 76 लाख मामले, 1.46 लाख मौतें।

पृष्ठभूमि: खुमैनी का उदय और अमेरिका की भूमिका

आयतुल्लाह रूहोल्लाह खुमैनी (1902-1989) एक शिया इस्लामी धार्मिक नेता थे, जो ईरान में राजशाही के खिलाफ थे। वे 1960 के दशक से शाह मोहम्मद रेज़ा पहलवी (Shah Mohammad Reza Pahlavi) के विरोधी थे, जिन्हें अमेरिका का समर्थन प्राप्त था। अमेरिका ने 1953 में ईरान के लोकतांत्रिक रूप से चुने गए प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्देक (Mohammad Mossadegh) को हटाने में CIA की मदद से तख्तापलट किया था, क्योंकि मोसद्देक ने तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण किया था, जो अमेरिकी और ब्रिटिश कंपनियों के हितों के खिलाफ था। इस घटना ने ईरान में अमेरिका विरोधी भावनाओं को बढ़ावा दिया, और खुमैनी ने इसे “अमेरिकी साम्राज्यवाद” का प्रतीक माना।

खुमैनी को 1963 में गिरफ्तार किया गया था, जब उन्होंने शाह की नीतियों (जैसे भूमि सुधार और महिलाओं के अधिकार) का विरोध किया, जिन्हें वे “पश्चिमी प्रभाव” मानते थे। गिरफ्तारी के बाद, खुमैनी ने अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ. कैनेडी को एक संदेश भेजा, जिसमें उन्होंने अमेरिका के साथ कोई झगड़ा न होने की बात कही, लेकिन शाह को अमेरिका का कठपुतली बताया। 1964 में उन्हें निर्वासित कर दिया गया, और वे इराक और फिर फ्रांस चले गए, जहाँ से उन्होंने ईरान में क्रांति का प्रचार किया।

1979 की ईरानी क्रांति और अमेरिका का संपर्क

1978-1979 में ईरान में शाह विरोधी प्रदर्शन तेज़ हुए, जो आर्थिक असमानता, दमन और पश्चिमी प्रभाव के खिलाफ थे। अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर (Jimmy Carter) की सरकार ने खुमैनी के साथ गुप्त संपर्क बनाए रखे। नवंबर 1978 में, कार्टर प्रशासन ने खुमैनी के प्रतिनिधियों से फ्रांस में बातचीत की, जिसमें खुमैनी ने अमेरिका को आश्वासन दिया कि उनका अमेरिका से कोई झगड़ा नहीं है, और वे ईरान के तेल हितों की रक्षा करेंगे। कार्टर ने ईरानी सेना को तख्तापलट से रोका, जिससे शाह की सरकार गिर गई। 1 फरवरी 1979 को खुमैनी ईरान लौटे, और 11 फरवरी को क्रांति सफल हुई, जिससे इस्लामी गणराज्य की स्थापना हुई।

हालाँकि, क्रांति के बाद संबंध बिगड़ गए। खुमैनी ने अमेरिका को “ग्रेट शैतान” (Great Satan) कहा, और इसे ईरान की समस्याओं का जड़ बताया। उन्होंने अमेरिका को साम्राज्यवादी और इस्लाम विरोधी माना, और ईरान को इस्लामी क्रांति का निर्यात करने का आह्वान किया।

प्रमुख संघर्ष: ईरान बंधक संकट (Iran Hostage Crisis)

खुमैनी और अमेरिका के बीच सबसे बड़ा “फाइट” 1979-1981 का ईरान बंधक संकट था। 4 नवंबर 1979 को, खुमैनी के समर्थक छात्रों (Muslim Student Followers of the Imam’s Line) ने तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर कब्जा कर लिया, और 66 अमेरिकियों को बंधक बना लिया (जिनमें से 52 को 444 दिनों तक रखा गया)। वे शाह की वापसी की मांग कर रहे थे, जिन्हें अमेरिका ने कैंसर इलाज के लिए शरण दी थी। खुमैनी ने इस हमले का समर्थन किया, और इसे “दूसरी क्रांति” कहा।

  • अमेरिका की प्रतिक्रिया: कार्टर ने आर्थिक प्रतिबंध लगाए, और अप्रैल 1980 में ऑपरेशन ईगल क्लॉ (Operation Eagle Claw) से बचाव की कोशिश की, जो विफल रही (8 अमेरिकी सैनिक मारे गए)। इस संकट ने कार्टर की पुनर्निर्वाचन हार में योगदान दिया।
  • समाप्ति: 20 जनवरी 1981 को, रोनाल्ड रीगन के राष्ट्रपति बनने के दिन, अल्जीरिया की मध्यस्थता से बंधक रिहा हुए। ईरान को 7.9 बिलियन डॉलर की संपत्ति वापस मिली।

इस घटना ने अमेरिका-ईरान संबंधों को हमेशा के लिए बिगाड़ दिया, और कूटनीतिक संबंध टूट गए।

ईरान-इराक युद्ध (1980-1988) और अमेरिका की भूमिका

1980 में, सद्दाम हुसैन के इराक ने ईरान पर हमला किया। अमेरिका ने इराक का समर्थन किया, क्योंकि खुमैनी की क्रांति को खतरा मानता था। अमेरिका ने इराक को हथियार, खुफिया जानकारी और आर्थिक मदद दी, जिसमें रासायनिक हथियारों का उपयोग भी शामिल था। खुमैनी ने इसे “अमेरिकी साजिश” बताया। युद्ध में लाखों ईरानी मारे गए, और 1988 में खुमैनी ने सीजफायर स्वीकार किया, जिसे उन्होंने “जहर का प्याला” कहा।

खुमैनी की विरासत और जारी संघर्ष

खुमैनी की 3 जून 1989 को मृत्यु हुई, लेकिन उनकी अमेरिका विरोधी विचारधारा (जैसे “अमेरिका कुछ नहीं कर सकता”) ईरान की नीति का आधार बनी। उनके उत्तराधिकारी अली खामेनी (Ali Khamenei) ने इसे जारी रखा, और अमेरिका को “नंबर वन दुश्मन” कहा। परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंध, और क्षेत्रीय प्रॉक्सी युद्ध (जैसे सीरिया, यमन) में संघर्ष जारी है। 2024-2025 में इजराइल-ईरान हमले और परमाणु संवर्धन ने तनाव बढ़ाया, लेकिन खुमैनी का “फाइट” मूल रूप से क्रांति और बंधक संकट से जुड़ा है।

यह संघर्ष ईरान को अलग-थलग कर देता है, लेकिन खुमैनी की विचारधारा ईरानी पहचान का हिस्सा है।

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